19 सितंबर 2016

रामायण की चोपाई के अर्थ का अनर्थ।

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आपने यदि रामायण पढ़ी हो तो कुछ याद हो न हो ,विशेषकर सुन्दरकाण्ड की एक चोपाई पर पूरा ध्यान चला जाता है । ढोल गंवार शुद्र पशु नारी, सकल तारणा के अधिकारी । इतिहास बताता है कि भारत की आज़ादी से पहले विदेशी आक्रमणकारियों ने उपने देशों के संस्कृत विद्वानों के द्वारा सनातन धर्म को विकृत करने के लिए कुचक्र चलाये गए थे जिसमें वे काफी हद तक सफल भी रहे। इसमें उन्होंने रामायण की चौपाई मे सकल तारणा को सकल ताड़ना बना दिया। शब्दों का यह ऐसा मामूली फेरबदल था कि पूरे श्लोक का अर्थ ही बदल दिया गया। पर एक न एक दिन सच्चाई सामने आ ही जाती है क्योंकि सच परेसान जरूर हो सकता है किन्तु पराजित कभी नहीँ।आइये इस चोपाई के शब्दों का अर्थ समझने की कोसिस करते है।
१. ढोल (वाद्य यंत्र)- ढोल को हमारे सनातन संस्कृति में उत्साह का प्रतीक माना गया है। इसके थाप से हमें नयी ऊर्जा मिलती है। इससे जीवन स्फूर्तिमय और उत्साहमय हो जाता है।आज भी विभिन्न अवसरों पर ढोलक बजाया जाता है। इसे शुभ माना जाता है।
२. गंवार (गांव के रहने वाले लोग )- भारत की आधी आबादी गांव मे बसती है। पाया जाता है कि गाँव के लोग छल-प्रपंच से दूर अत्यंत ही सरल स्वभाव के होते हैं, साथ ही अत्यधिक परिश्रमी भी होते है । जो अपने परिश्रम से धरती माता की कोख से अन्न इत्यादि पैदा कर संसार में सबकी भूख मिटाते हैं। आदि-अनादि काल से ही अनेकों देवी-देवता और संत महर्षि गण गाँव में ही उत्पन्न होते रहे हैं। यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि सरलता में ही ईश्वर का वास होता है।
३. शुद्र (जो अपने कर्म व सेवाभाव से इस लोक की दरिद्रता को दूर करे)। सारे वर्ण कर्मों के अनुकूल है। जन्म से कोई छोटा बड़ा नही है। सेवा वह श्रेष्ठ कर्म है जिससे हमारे जीवन व दूसरों के जीवन का उद्धार होता है । जो मनुष्य सच्ची सेवा व कर्म भाव से लोक का कल्याण करे, वही ईश्वर का प्रिय पात्र होता है। कर्म ही पूजा है।
४. पशु  (जो एक निश्चित पाश में रहकर हमारे लिए उपयोगी हो) - प्राचीन काल और आज भी हम अपने दैनिक जीवन में भी पशुओं से उपकृत होते रहे हैं। पसुवों का मानव जीवन पर बहुत उपकार है। ये अलग बात है कि  मानव ने पशूओं को अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए बहुत हानि पहुँचाई है। पहले वाहन और कृषि कार्य में  पशुओं का ही उपयोग किया जाता था। आज भी हम दूध, दही. घी , मट्ठा , पनीर, क्रीम, इत्यादि के लिए हम पशुओं पर ही निर्भर हैं। पशुओ के बिना हमारे जीवन का कोई औचित्य ही नहीं है। वर्षों पहले जिसके पास जितना पशु होता था उसे उतना ही समृद्ध माना जाता था। गोऊ धन, गज धन  को रत्नों की खान से कमतर नही आंका जाता था। सनातन में पशुओं को प्रतीक मानकर पूजा जाता है।
५. नारी ( जगत -जननी, आदि-शक्ति, मातृ-शक्ति )- नारी के बिना इस चराचर जगत की कल्पना ही मिथ्या है।  नारी का हमारे जीवन में माँ, बहन ,बेटी , पत्नी इत्यादि के रूप में बहुत बड़ा योगदान है। नारी के ममत्व से ही हम हम अपने जीवन को भली-भाँती सुगमता से व्यतीत कर पाते हैं। विशेष परिस्थिति में नारी पुरुष जैसा कठिन कार्य भी करने से पीछे नहीं हटती है। जब जब हमारे ऊपर घोर विपत्तियाँ आती है तो नारी दुर्गा, काली, लक्ष्मीबाई बनकर हमारा कल्याण करती है। इसलिए सनातन संस्कृति में नारी को पुरुषों से अधिक महत्त्व प्राप्त है।

सकल तारणा के अधिकारी से यह तात्पर्य है-
१. सकल=  सबका
२. तारणा= उद्धार करना
३. अधिकारी = अधिकार रखना
उपरोक्त सभी से हमारे जीवन का उद्धार होता है ।इसलिए इसे उद्धार करने का अधिकारी कहा गया है.

अब यदि कोई व्यक्ति या समुदाय विधर्मियों या पाखंडियों के कहने पर अपने ही सनातन को माध्यम बनाकर. उसे गलत बताकर अपना स्वार्थ सिद्ध करता है तो ऐसे विकृत मानसिकता वालों को भगवान् सद्बुद्धि दे, तथा सनातन पर चलने की प्ररेणा दे। ज्ञात रहे सनातन सबके लिए कल्याणकारी था , कल्याणकारी है और सदा कल्याणकारी ही रहेगा। सनातन सरल है । इसे सरलता से समझे और औरों को भी जागरूक करें। कुतर्क पर न चले। अपने पूर्वजों पर सदेह करना अपनी संस्कृति को कमजोर करना है, महापाप है।
इसलिए जो भी रामचरितमानस सुन्दरकाण्ड के चौपाई का अर्थ गलत समझाए तो उसे इसका अर्थ जरूर समझाए और अपने धर्म की रक्षा करे। अपने से कमजोर को प्रताड़ित करना, उसको परेसान करना, उसको खा जाने वाली जानवर प्रवृति को ध्यान मे रखकर ही पूर्वजों ने धर्म की स्थापना करने की मजबूरी महसूस की गयी होगी। जिसमें प्रत्येक जीव पर दया और परोपकार को अनिवार्य रूप से धारण किये जाने वाले धर्म का आधार बनाया गया होगा । जो इसके  विपरीत चले, उसको अधर्म के रूप मे परिभाषित किया गया है। क्योंकि मजहब नहीँ सिखाता आपस मे बैर रखना।

18 सितंबर 2016

खजुराहो की कामुक मूर्तियों के पीछे की कहानी ?

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'खजुराहो' भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त में, छत्तरपुर ज़िले में स्थित एक प्रमुख शहर है, जो अपने प्राचीन एवं मध्यकालीन मंदिरों के लिये विश्वविख्यात है। यह क्षेत्र प्राचीन काल में वत्स के नाम से, मध्य काल में जैजाक्भुक्ति नाम से तथा चौदहवीं सदी के बाद बुन्देलखन्ड के नाम से जाना गया। खजुराहो के चन्देल वंश का उत्थान दसवीं सदी के शुरू से माना जाता है। इनकी राजधानी प्रासादों, तालाबों तथा मंदिरों से परिपूर्ण थी। स्थानीय धारणाऑं के अनुसार तक़रीबन एक हज़ार साल पहले यहां के दरियादिल व कला पारखी चंदेल राजाओं ने क़रीब 84 बेजोड़ व लाजवाब मंदिरों की तामीर करवाई थी, लेकिन उनमें से अभी तक सिर्फ़ 22 मंदिरों की ही खोज हो पाई है, यद्यपि दूसरे पुरावशेषों के प्रमाण प्राचीन टीलों तथा बिखरे वास्तुखंडों के रूप में आज भी खजुराहो तथा इसके आसपास देखे जा सकते हैं। 

पंद्रहवीं सदी के बाद इस इलाक़े की अहमियत ख़त्म होती गई। खजुराहो का प्राचीन नाम 'खर्जुरवाहक' है। 900 से 1150 ई. के बीच यह चन्देल राजपूतों के राजघरानों के संरक्षण में राजधानी और नगर था, जो एक विस्तृत क्षेत्र 'जेजाकभुक्ति' (अब मध्य प्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र) के शासक थे। चन्देलों के राज्य की नींव आठवीं शती ई. में महोबा के चन्देल नरेश चंद्रवर्मा ने डाली थी। तब से लगभग पाँच शतियों तक चन्देलों की राज्यसत्ता जुझौति में स्थापित रही। इनका मुख्य दुर्ग कालिंजर तथा मुख्य अधिष्ठान महोबा में था। 11वीं शती के उत्तरार्द्ध में चन्देलों ने पहाड़ी क़िलों को अपनी गतिविधियों का केन्द्र बना लिया। लेकिन खजुराहो का धार्मिक महत्त्व 14वीं शताब्दी तक बना रहा। इसी काल में अरबी यात्री इब्न बतूता यहाँ पर योगियों से मिलने आया था। खजुराहो धीरे-धीरे नगर से गाँव में परिवर्तित हो गया और फिर यह लगभग विस्मृति में खो गया।

खजुराहो में 1 और 2 सितंबर को ब्रिक्स सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमें ब्राजील, चीन, रूस, साउथ अफ्रीका जैसे देश शामिल हुए.. खजुराहो मंदिर की मूर्तियों के बारे में भारतीय जनमानस में हमेशा से एक अलग ही विचार रहा है. लेकिन सच्चाई उससे कहीं अलग है जो वामपंथी इतिहासकारों के कारण सामने नहीं आई है पाश्चात्य प्रभाव के कारण हमेशा से आधुनिक भारत में सेक्स को निकृष्ट दृष्टि से देखा जाता है और आधुनिक लोग पश्चिम जीवन दर्शन को स्वच्छन्द मानते है 

मोर्य वंश के महान सम्राट चन्द्रगुप्त के पौत्र महान अशोक ने कलिंग युद्ध के पश्चात् बौद्ध धर्म अपना लिया। अशोक ने एक बौद्ध सम्राट के रूप में लगभग २० वर्ष तक शासन किया। आचार्य चाणक्य ने जिस अखंड भारत के निर्माण हेतु आजीवन संघर्ष किया उसका लाभ सनातन धर्म को मिल पाया, आचार्य चाणक्य के स्वर्गवास के बाद चन्द्रगुप्त ने जैन धर्म अपना लिया और जैन सम्प्रदाय के प्रचार प्रसार में ही जीवन व्यतीत किया, 


सम्राट बिन्दुसार और सम्राट अशोक धर्म के बड़े अनुयायी थे l यह वह कालखंड था जब शासन से बौद्ध धर्म के अनुयायियों को सारी सुविधाओं दी जा रही थी और शस्त्र और सुविधाओ के बल पर 90% लोग बौद्ध धर्मं अपना चुके थे .बौद्ध प्रभाव के चलते यौन भावनाओं  न सिर्फ संकोच होने लगा बल्कि इसे पाप पुन्य से जोड़ कर देखा जाने लगा l अब यहाँ पुरुष तो बौद्ध के सिधान्तों पर चलने लगे, परन्तु  स्त्रियों के मन में अभी भी प्रेम भावना से संबंध बनाने की भावनाएं रहती थी l इसी काल में जब यवनों का भारत पर आक्रमण हुआ, तब यहाँ बौद्ध मठ विलासिता का केंद्र बनने लगे थे.. यवनों ने बौद्ध स्त्रियों के साथ शारीरिक संबंध कायम किये जिससे भारत  सीमाएं असुरक्षित होने लगी. जब बौध धर्म के अनुयायी वृहद्रथ के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने भारत को यवनों के द्वारा लुटते देखा तो पुष्यमित्र शुंग ने वृहद्रथ की हत्या करके शासन को अपने हाँथ में लिए और पुनः वैदिक धर्म की स्थपाना की लेकिन चूँकि भारत में उस काल में लोग गृहस्थ आश्रम त्याग चुके थे  इसलिए उनकी काम भावना ख़त्म हो चुकी थी  अब वंश आगे कैसे बढे इसके लिए लोगों की काम भावना जागृत करना आवश्यक हो गया  इसी वजह से भारत में अजंता अल्लोरा की गुफाओं और खजुराहो जैसे मंदिरों का निर्माण हुआ होगा ताकि वापस यहाँ के लोगों में यौन भावना को जगाया जाए और वे वापस इस तरफ आकर्षित हो अपना वंश कायम कर सकें l

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित खजुराहो मंदिर में ऐसी मूर्तियाँ हैं जिसमे स्त्री और पुरुषों के यौन संबंध बनाते हुए झलक देखने मिलती है। किसी समय यह स्थान खजूर के जंगल के लिए जाना जाता था। इसी वजह से इसका नाम खजुराहो पडा है। पर अब यह खजूरों के लिए नहीं बल्कि इन मूर्तियों के लिए फेमस है  इन काम क्रिया करती मूर्तियाँ श्रद्घालुओं और दर्शनार्थियों के लिए आश्चर्य  बन जाती हैं, कि काम-इच्छा और मुक्ति का ऐसा मेल आखिर क्यूँ है  इस विषय में कई सारी कथाएँ हैं जो यह भेद खोलती हैं कि मंदिर की दीवारों पर कामुक मूर्तियां क्यों बनाई गयी हैं 
इस मंदिर के बारे में एक कहानी और बताई जाती है कि जिसमे हेमावती नाम की एक ब्राह्मण कन्या का ज़िक्र आता हैl वह वन में स्थित सरोवर में स्नान कर रही थी तभी चंद्रमा ने उसे देख लिया और और उसे देखते ही मुग्ध हो गया l फिर चंद्रमा ने हेमावती को वशीभूत कर लिया और उसके साथ संबंध बना लिए l पर जब हेमावती ने इसी से एक बालक को जन्म दिया तब समाज ने उसे और उसके बालक को अपनाने से इंकार कर दिया l इस कारण उसे बच्चे का पालन पोषण भी वन में रह कर ही करना पड़ा l बालक का नाम चन्द्रवर्मन रखा गया जिसने बड़े होने के बाद उसी बालक चन्द्रवर्मन ने अपना राज्य कायम किया। तब उसकी माँ हेमावती ने चन्द्रवर्मन को ऐसा एक मंदिर तैयार करने के लिए प्रेरित किया जिससे सभी लोगों के अंतर में दबी हुई कामनाओं का खोखलापन दिखाई दे ताकि जब इसी मंदिर में प्रवेश करें तो बुराइयों को द्वार पर ही छोड़ आये l
उस ज़माने में यौन ऐसी चीज़ नहीं थी जिसमे बहुत से प्रतिबन्ध लगाये जाएँ l  हरिवंश पुराण अध्याय के अनुसार, मनु ने अपनी पुत्री इला, वशिस्ठ ने अपनी पुत्री सतरूपा, और सूर्य ने ऊषा से विवाह किया। अच्छी संतानोत्पत्ति के लिए आर्य लोग देव वर्ग के किसी भी पुरुष के साथ अपनी स्त्रियों को सम्भोग की अनुमति देते थे जिसे अवदान कहा गया है। यहाँ तक भी बात थी कि पशुओं के साथ भी काम क्रिया आर्यों में पशुओं के साथ यौनाचार करना भी प्रचलित था! ऋषि किन्दम द्वारा हिरनी के साथ मैथुन किये जाने की कहानी के बारे में काफी लोग जानते हैं । 

17 सितंबर 2016

वास्तुशास्त्र और फेंगशुई

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हर देश की अपनी संस्कृति होती है, अपनी मर्यादायें होती हैं। चीन के धार्मिक ग्रन्थ ‘टायो’ पर आधारित फेंगसुई प्राचीन चीनी दार्शनिकों के चिन्तन का परिणाम है, जिसमें इस बात पर गहन चिंतन किया गया है कि  प्राकृतिक शक्तियॉ का  प्रभाव मानव जीवन और उसके निवास स्थान  को किस तरह और कैसे प्रभावित करता है। फेंगसुई के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या करें तो फेंग का अर्थ है वायु तथा सुई का अर्थ जल से है । फेंगसुई शब्द वायुतत्व और जलतत्व का समन्वय है।

विश्व की सबसे पुरातन और प्रथम वैदिक संस्कृति के कारण चीनी फेंगसुई के लगभग सभी सिद्धान्त भारतीय वास्तुशास्त्र से मिलते-जुलते है। सिर्फ दो  ही सिद्धान्त एकदम विपरीत है। चीन में दक्षिण दिशा को शुभ माना जाता है जबकि भारत में यह दिशा अशुभ मानी जाती है। चीन में आग्नेय कोण में जल संग्रह, फव्वारा, पौधे लगाना एंव मछली घर रखना अत्यन्त सुखदायी माना जाता है, जबकि भारत में आग्नेय कोण में जल से समबन्धित वस्तुयें रखना अहितकारी माना जाता है। फेंगसुई के ये दो सिद्धान्त भारतीय विचारधारा से भिन्न माने जाते है।परन्तु ऐसा दोनों देशों की भिन्न-भिन्न जलवायु के कारण प्रतीत होता है। चीनी फेंगसुई हो या भारतीय वास्तुशास्त्र दोनों ही अपने-अपने क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों, पर्यावरण तथा सांस्कृतिक पहलुओं का प्रतिनिधित्व करती है। अतः दोनों विदयाओं का जनमानस के जीवन में प्रयोग को सकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है।

इतिहास गवाह है कि एक संस्कृति का दूसरी संस्कृति पर सांस्कृतिक आक्रमण भी होता है। चीन के नजरिये से इस बात की पुष्टि भी होती है। फंगसुइ के भारत व विश्व के अन्य देशों में प्रचार व प्रसार को इसी सन्दर्भ में देखा जाना व्यावहारिक है। 






16 सितंबर 2016

विज्ञान आधारित सटीक वैदिक काल गणना।

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सनातन वैदिक विज्ञान की गहराई की आज के युग के विज्ञान के सामने भी अपनी  श्रेष्ठता की छाप बरकरार है। इसकी पुष्टि विश्व मे बिज्ञान की सबसे उन्नत अमेरिकी एजेंसी नासा द्वारा भी समय समय पर की गयी है। इसकी गहराइयों का कोई अंत नही।  ऐसी  ही सर्वोत्तम,  विराट तथा बारीक़ से बारीक़ काल गणना हमारे सनातन शास्त्रों के अतिरिक्त कहीं किसी संस्कृति मे मौज़ूद नहीं है । आइये  एक नजर इसमे डाली जाए :-
क्रति = सैकन्ड का 34000वाँ भाग
1 त्रुति = सैकन्ड का 300वाँ भाग
2 त्रुति = 1 लव
1 लव = 1 क्षण
30 क्षण = 1 विपल
60 विपल = 1 पल
60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट )
2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा)
24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार)
7 दिवस = 1 सप्ताह
4 सप्ताह = 1 माह
2 माह = 1 ऋतु
6 ऋतु = 1 वर्ष
100 वर्ष = 1 शताब्दी
10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी
432 सहस्राब्दी = 1 युग
2 युग = 1 द्वापर युग
3 युग = 1 त्रेता युग
4 युग = सतयुग
1 महायुग = सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग
76 महायुग = मनवन्तर
1000 महायुग = 1 कल्प
1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ)
1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प (देवों का अन्त और जन्म)
1 महाकाल = 730 कल्प (ब्रह्म का अन्त और जन्म)

अब आप खुद ही समझ सकते है कि हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है। ये इस देश का दुर्भाग्य ही है कि हमारी परम्पराओं को समझने के लिए जिस विज्ञान की आवश्यकता है , वो हमें पढ़ाया नहीं जाता ।  विज्ञान के नाम पर जो हमें पढ़ाया जाता  रहा है उससे हम अपनी परम्पराओं को समझ नहीं सकते । विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यही है। जो हमारे पूर्वजों की अनमोल धरोहर है।

15 सितंबर 2016

सूर्य मिसाइल, एक मिनट में छः देश तबाह ।

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भारत के वैज्ञानिकों ने अबकी बार सेना को मजबूत करने के लिए कमर कस ली है ।प्रत्येक माह भारतीय वैज्ञानिक भारतीय सेना की ताक़त बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के हथियार बनाकर भरात की ताकत में इजाफा करते जा रहे हैं । हालांकि भारत का उद्देश्य किसी देश को निसाना बनाना या लड़ाई की अगुवाई करना नही है बल्कि ये सभी हथियारों को बनाने का उद्देश्य आत्मरक्षा है। वक़्त जरूरत पड़ने पर इनका  प्रयोग भी किया जा सके । भारतीय सेना के पास  एक के बाद एक अत्याधुनिक हथियारों का इजाफा होने के कारण भारत बिश्व की महाशक्तियों मे अपनी जगह बना रहा है, जो देश के लिए सुभ संकेत तो है ही साथ ही भारत को नुक्सान पहुचाने की सोच रखने वाले देशों के लिए एक चेतावनी भी है। रक्षा क्षेत्र मे सामिल लड़ाकू विमान हो या फिर घातक मिसाइलें हों, भारत अब आत्मरक्षा के साथ साथ आकस्मिक युद्ध को फतह करने की स्तिथि मे भी आ गया है ।


अब भारत सूर्य मिसाइ पे काम कर रहा है । बताया जा रहा  है कि इस मिसाइल का परीक्षण 2017 में हो सकता है। ये मिसाइल एक साथ  कई परमाणु हथियार ले जाने  में सक्षम हैं । सूर्य मिसाइल की मारक क्षमता दस से बारह हज़ार किमी तय की गयी है । यह एक इंटरकॉन्टीनेंटल मिसाइल है । इस मिसाइल के भारतीय सेना में शामिल हो जाने के बाद भारत  अपनी धरती से यूरोप, एशिया, अफ्रीका, अलास्का, उत्तरी कोरिया और कनाडा तक एक साथ सभी देशों पर सटीक निशाना साध सकता है। अमेरिका के पास पहले  से तेरह हज़ार किमी, रूस के पास दस हज़ार किमी, चीन के पास चौदह हज़ार किमी की मारक क्षमता वाली ऐसी मिसाइल मौजूद है।  उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष के अंत तक भारत अपने वहां निर्मित मिसाइलों के एक्सपोर्ट करने के साथ साथ इनके समकक्ष विदेशी मेसाइलों को अपने खेमें में सामिल कर सकता है।








13 सितंबर 2016

इकलौता अमर प्राणी "हाइकू"।

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वैसे तो पूर्वकाल मे इन्सान और जानवर एक दुसरे के पूरक थे जिसका शास्त्रों मे भी काफी वर्णन मिलता है ।उस काल मे इन्सान ने भी जानवरों का बेमतलब इतना वध नही किया होगा जितना वर्तमान काल मे दिख रहा है। कहा जाता है कि  नेपाल में पाया जाने वाला अनूठा  प्राणी हाइकु जिसका पुराणों में वर्णन आता है , स्वयं पार्वती माता ने इस सुंदर जीव को अपने पवित्र हाथों से केला खिलाया था। और योगेश्वर शिव जी ने इस प्राणी को अमर ( एक महायुग ) तक रहने का वरदान दिया था। इस प्राणी को सायद ही आपने कहीँ देखा हो क्योंकि यह अकेला होने के बाबजूद कम ही लोगों को दिखाई देता है। जिसने भी इसे देखा है वे बताते है कि उन्होंने उसे अकेला ही देखा, किसी और प्राणी के साथ नही । साथ ही आजतक कभी भी किसी को यह जोड़े मे नही दिखाई दिया है। जिन लोगों ने इस प्राणी को देखा है, वह बताते है कि यह हमेसा अकेला ही दिखाई दिया है। मान्यता है कि संसार मे यह एक ही इकलौता जीव है  जो पौराणिक काल से आज तक अमर होकर जी रहा है। यह देखने वाले सौभाग्यसाली व्यक्ति अमर बहादुर द्वारा हाइकू का काल्पनिक चित्र  है।
 गर्मियों से पहले वसंत के मौसम में यह अक्सर दिखाई देता है। और कुछ दिन बाद यह फिर सुदूर हिमालय की वर्फीली  पहाड़ियों में चला जाता है । यह प्राणी नेपाल ,भारत और कैलास पर्वत के स्थानों मे ही विचरण करता है।जिस  प्रकार नीलकंठ पक्षी के दर्शन करने को  पुण्य माना जाता है। इसी प्रकार नेपाल की संस्कृति मे इसके दिखने को अति सोभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
यदि आपने हकीकत मे इसको नही देखा है तो इसको पहचान लीजिये, हो सकता है यह पवित्र जीव आपको ब्लॉगर के माध्यम के अनुरूप साक्षात दिख जाए।

12 सितंबर 2016

महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में ही क्यों ?

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महाभारत के युद्ध को दुनिया का पहला विश्वयुद्ध माना जाता है। रहस्यों में से एक रहस्य यह है कि आखिर क्यों महाभारत का युद्ध अन्य सभी युद्ध स्थलों को छोड़कर केवल कुरुक्षेत्र में ही लड़ा गया था ? इस युद्ध में कौरवों और पाण्डवों के साथ ना केवल सभी हिन्दुस्तानी राजाओं ने हिस्सा लिया था बल्कि सम्पूर्ण विश्व के सभी देशों जैसे यमन, मिस्र इत्यादि देशों के राजाओं ने भी अपना अपना पक्ष चुनते हुए महाभारत के इस ऐतिहासिक युद्ध म हिस्सा लिया था।  इस युद्ध को कई कारणों से याद रखा जाता है क्योंकि महाभारत के युद्ध में कई गहरे राज छुपे हुए हैं, जिनका आज तक कोई खुलासा नहीं हो पाया है।
हम सबने महाभारत मे पढा है कि कौरव और पांडव  ये दोनों पक्ष इस ऐतिहासिक युद्ध का हिस्सा थे । साथ ही दोनों एक ही वंश (कुरु वंश)  का हिस्सा थे। दोनों पक्षों के लोग महाराजा कुरु के वंश के थे। बहुत साल पहले इसी वंश में ‘कुरु’ नाम के प्रतापी राजा हुए थे जिनके नाम से ही इस वंश का नाम आगे बढ़ा । राजा कुरु की हमेशा से यही इच्छा थी कि वे अपने जीते जी एक ऐसे स्थान का निर्माण कराएं, जहाँ मृत्यु प्राप्त करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को स्वर्गलोक की प्राप्ति हो। इस काम के लिए उन्होंने एक बहुत ही बड़े भू-भाग को चुना और उसमें हल चलवाकर उसकी जुताई प्रारम्भ करवा दी । उनके इस कार्य को देखकर देवराज इंद्र के मन में उत्सुकता उठी कि राजा कुरु ऐसा किसलियेइ और क्यों कर रहे हैं।अतः उन्होंने स्वयं जाकर उनसे इस बात का कारण पूछा। तब राजा कुरु ने बताया कि मैं एक ऐसा क्षेत्र बनाना चाहता हूँ जहाँ मृत्यु प्राप्त करने वाले हर व्यक्ति को स्वर्ग धाम की प्राप्ति हो। यह सुनकर इंद्रदेव उनके ऊपर हँसने लगे और वापस अपने लोक में चले गए। इधर इंद्र के उपहास की परवाह किये बगैर राजा कुरु अपने काम में सच्चे मन से लगे रहे। वहीं स्वर्गलोक पर देवराज इंद्र सभी को यह बात बताते और हँसते परन्तु कुछ समय बाद भी जब राजा कुरु अपने काम में लगे रहे तो उन्हें लगा कि अब राजा कुरु को उनकी सच्ची मेहनत का फल अवश्य देना चाहिए ।
एक दिन राजा इंद्र ने कुरु को दर्शन दिये और कहा कि आपकी लगन, मेहनत और द्रढ इच्छासक्ति से प्रसन्न होकर मे आपको वचन देता हूँ कि  कोई भी व्यक्ति, पशु,पक्षी या अन्य जीव इत्यादि इस स्थान पर बिना भोजन के अथवा युद्धभूमि में लड़ते हुए मृत्यु को प्राप्त करेगा तो वह मृत्यु के पश्चात स्वर्गलोक का भागीदार बनेगा। ऐसा कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए। इसी कारण से इस भू-भाग का नाम कुरुक्षेत्र पड़ा। इस रहस्य के बारे में कृष्ण, द्रोणाचार्य और भीष्म जैसे महारथी जानते थे। इसी वजह से उन्होंने युद्ध करने के लिए कुरुक्षेत्र जैसे पवित्र स्थल को चुना कहा तो यह भी जाता है कि इस स्थान पर मृत्यु प्राप्त करने वाला कोई भी जीवित व्यक्ति या प्राणी इस मृत्युलोक में दुबारा जन्म नहीं लेता बल्कि सीधा मोक्ष को प्राप्त करता है। यहाँ तक कि इस भू-भाग की उड़ती हुई धूल को भी बहुत पवित्र माना जाता है । सी वजह से महत्वपूर्ण ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता में इस पवित्र कुरुक्षेत्र की भूमि को धर्मक्षेत्र भी कहा जाता है।

11 सितंबर 2016

हवा भर कर फूलने वाली पोर्टेबल मच्छरदानी

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जरूरत आविष्कार की जननी है। वैसे तो भारत के लोग तरह तरह के नवीनतम आईडिया लगाकर कम से कम संसाधनों मे वस्तुओं के निर्माण के लिए दुनिया भर मे मसहूर है। इस निर्माण का नाम जुगाड़ है। क्योंकि जुगाड़ कम समय मे कम संसाधनों के रहते काम चलाऊ व्यवस्था करने का नाम है। इसी काम मे माहिर भारतीय मूल के एक  शौकिया वैज्ञानिक ने एक ऐसी मच्छरदानी विकसित की है, जिसे हवा भरकर मच्छरदानी के अलावा बिस्तर पर चादर की तरह भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इस उत्पाद की कीमत एक हज़ार रुपये से कुछ कम हो सकती है। 60 वर्षीय एम. सी. डेविड कई सालों से नए-नए खोज कर रहे हैं और हाल ही में उन्हें तीसरा पेटेंट हासिल हुआ है जो हवा भर कर फूलने वाली पोर्टेबल मच्छरदानी के लिए मिला है।
डेविड ने बताया, “मुझे हाल में ही इसका भारतीय पेटेंट मिला है। कुछ लोगों से इसके बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उत्पादन के लिए बातचीत हो रही है। मैं आश्वस्त हूं कि यह उत्पाद जिसे एक चादर की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता है और जिसका वजन करीब एक किलोग्राम हैं,पेटेंट हो जाने के बाद बाजार में महज एक हज़ार रुपये के आस पास उपलब्ध होगी।” उन्होंने कहा कि इस मच्छरदानी में कोई धातु या नुकीले किनारे नहीं है ताकि छोटे बच्चे सुरक्षित रहें , साथ ही और इसे तेजी से लगाया और खोला जा सकता है। इसको इस्तेमाल करने के लिए आपको साइकिल की ट्यूब मे हवा भरने वाली पंप की आवश्यकता होगी, जो बहुत कम कीमत मे बाज़ार मे उपलब्ध है। यदि आपकी फूंक तगड़ी है तो आप बिना पंप के भी इसमे हवा भरकर आराम से सो सकते है।

10 सितंबर 2016

कुदरती दवा, पीपल का पत्ता।

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आजकल असंतुलित खान पान के कारण कई किस्म की बीमारियां शरीर मे हो रही है जिसमे हार्ट अटैक और हार्ट फ़ैल प्रमुख है । वैसे तो सारी की सारी दवायें पेड़ और पौंधों से ही बनाई जाती है लेकिन कुदरत ने इस बीमारी के लिए बहुत आसान सा तोहफा दिया है। पीपल के पत्ते को इसके उपचार के लिए उपयुक्त माना गया है। कुदरत ने उसका आकार भी दिल के आकार का ही बना दिया है ताकि अनपढ़ को भी समझना आसान हो सके। पीपल का पेड़ वैसे तो सनातन धर्म के लोगों के द्वारा पूजा भी जाता है। इसका वैज्ञानिक कारण भी है। पीपल का पेड़ लगातार कार्बन को शोषित करता है और निर्बाध रूप से ऑक्सीजन प्रदान करता है जो मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है । साथ ही पर्यावरण के लिए भी महत्वपूर्ण है। पीपल के पत्ते की यह विशेषता है कि  इसका तरीके से सेवन किया जाए तो यह 99 प्रतिशत ब्लॉकेज को भी खत्म कर देता है ।

इसको दवाई के रूप मे लेने का तरीका बहुत सरल है। पीपल के 15 पत्ते लें जो कोमल, गुलाबी हों। पत्ते हरे और भली प्रकार विकसित हों।पत्तों की कोपलों का इस्तेमाल न करें। अब छाँटे गए प्रत्येक पत्ते का ऊपर व नीचे का कुछ भाग कैंची से काटकर अलग कर दें। पत्ते के बीच के भाग को पानी से साफ कर लें। इन्हें एक गिलास पानी में धीमी  धीमी आँच पर पकने दें। जब पानी उबलकर एक तिहाई रह जाए तो ठंडा होने पर साफ कपड़े से छान लें और उसे ठंडे स्थान पर रख दें। आपकी दवा तैयार ।
इस काढ़े की तीन खुराकें सुबह के नास्ते के बाद 3-3 घंटे बाद लें। हार्ट अटैक के बाद कुछ समय हो जाने के पश्चात लगातार पंद्रह दिन तक इसे लेने से हृदय पुनः स्वस्थ हो जाता है और फिर दिल का दौरा पड़ने की संभावना नहीं रहती । 



पीपल के पत्ते में दिल को बल और शांति देने की अद्भुत क्षमता है। इस पीपल के काढ़े की तीन खुराकें सवेरे 8 बजे, 11 बजे व 2 बजे ली जा सकती हैं। इसके काढे को  लेने से पहले पेट एक दम खाली नहीं होना चाहिए, बल्कि सुपाच्य व हल्का नाश्ता करने के बाद ही लें। प्रयोगकाल में तली चीजें, चावल आदि न लें। मांस, मछली, अंडे, शराब, धूम्रपान का प्रयोग बंद कर दें। नमक, चिकनाई का प्रयोग बंद कर दें। सैंधा नमक का प्रयोग हितकारी होता है। अनार, पपीता, आंवला, बथुआ, लहसुन, मैथी दाना, सेब का मुरब्बा, मौसंबी, रात में भिगोए काले चने, किशमिश, गुग्गुल, दही, छाछ आदि लें। 



9 सितंबर 2016

बुखार को दूर करने के अचूक घरेलू नुस्खे

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मौसम बदलते ही जिस समस्या से हम सब को रूबरू होना पड़ता है वो है बुखार। वैसे बुखार कोई बिमारी नहीं होता यह बस एक संकेत होता है। अगर आपको बुखार आने लगे तो इसका मतलब होता है कि आप किसी न किसी बिमारी का शिकार हो चुके हैं। अगर बुखार का समय पर इलाज ना कराया जाये तो बुखार और भी कई बीमारियों का कारण बन जाता है। अगर आपको शरीर में थकान एवं कमज़ोरी महसूस हो रही है या जीभ का स्वाद चला गया है तो सकर्त हो जाएं। बुखार को दूर करने के लिये घरेलू औषधियां बहुत ही कारगर होती हैं।
बुखार को दूर करने के घरेलू नुस्खे :
  1. यदि किसी को तेज बुखार आ जाये तो सूती मोज़े लें। अब इन मोजो को ठंडे पानी में डालें। इन मोजो का एक्स्ट्रा पानी निचोड़ कर पैरों में पहना दें। जब यह मोज़े पैरों में सुख जाए तो दुबारा इस प्रक्रिया को दोहराए। इससे शरीर का तापमान कम होगा।
  2. एक गिलास पानी में एक बड़ा चम्म्च धनिया के बीच डालकर उबाल लें। इसके बाद इसमें थोड़ा दूध और चीनी मिलाएं। धनिया की चाय तैयार है, इसे पीने से बुखार में बहुत आराम मिलता है।
  3. यदि किसी व्यक्ति को तेज बुखार हो तो उसके उपचार के लिए कच्चे आलू का टुकड़ा लेकर रोगी के तलुओं और हथेली मे रगड़ें, रोगी को खुला रखें उसके सिर पर ठंडी पट्टियाँ रखें। इससे बुखार कम होने लगेगा।
  4. एक भाग चावल और आधा भाग पानी डालकर चावल के आधा पकने तक पकाएं। इसके बाद पानी को निथार कर अलग कर लें और इसमें स्वादानुसार नमक मिलाकर, गर्म गर्म ही पिएं। इससे बुखार में बहुत आराम मिलता है।
  5. निम्बू अनेक बीमारियों को ठीक करने के साथ-साथ बुखार का भी रामबाण इलाज है। इसके प्रयोग के लिए निम्बू को काट कर उसका एक टुकड़ा लें और उससे अपने पैरों के तलों पर मसाज करें। इस प्रयोग से आपको आसानी से बुखार की समस्या से राहत मिलेगी।
  6. जब भी आप नहाने जाए तो नहाने के पानी में आधा कप सिरका मिला कर दस मिनट के लिए ऐसे ही छोड़ दें। अब इस पानी से नहाए. इससे आपको फायदा होगा।
  7. तुलसी के सेवन से सभी प्रकार के बुखारों में लाभ होता है। 20 तुलसी के पत्ते, 10 कालीमिर्च और एक चम्मच शक्कर का काढ़ा मिलाकर सेवन करने से बुखार में लाभ होता है।
  8. आधा प्याज का टुकड़ा लेकर उसके रस में एक चुटकी कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर सुबह और शाम में पीने से बुखार में आराम मिलता है।
  9. 20 ग्राम शुद्ध शहद, आधा ग्राम सेंधानमक और आधा ग्राम हल्दी को पीसकर गर्म पानी में डालकर रात को पीने से बुखार और जुकाम ठीक हो जाता हैं।
  10. 10 ग्राम सेंधानमक और 40 ग्राम देशी चीनी (बूरा) को मिलाकर बारीक पीस लें। इस चूर्ण को आघा चम्मच रोजाना 3 बार गर्म पानी से लेने से मलेरिया बुखार आना बन्द हो जाता है।

7 सितंबर 2016

एक मुस्लिम देश, जो है ‘राम’ का दीवाना ।

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 एक ऐसा देश भी है जहाँ दुनिया के सबसे ज्यादा 87.2 प्रतिशत मुस्लिम रहते हैं, यहां की संस्कृति हिन्दू है। सब लोग कुरान पढ़ते है, मस्ज़िद मे जाते है, मोहम्मद साहब को मानते है लेकिन रामलीला भी करते हैं।ये लोग पांडवों को और रामचंद्र जी को अपना पूर्वज मानते है।और वह भारत के एक महाकाव्य ‘रामायण’ के दीवाने है। रामायण और महाभारत की कथायें पढ़ते है। आपको शायद यकीन न हो,  यहां राम की नगरी अयोध्या भी स्थित है, जो यहां की जनता के लिए आस्था का प्रतीक है। इस देश के मुसलमान राम को अपने जीवन का नायक और रामायण को अपने दिल का सबसे करीबी ग्रंथ मानते हैं।रामायण का यहां इतना ज़्यादा प्रभाव है कि यहाँ के कई इलाकों में रामायण के अवशेष और पत्थरों पर नक्‍काशी पर रामकथा के  पोराणिक चित्र मिलते हैं।23 करोड़ की आबादी वाले इस देश का नाम इंडोनेशिया है। यह दुनिया का चौथा सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला देश है और इसकी राजधानी जकार्ता है।भारतीयों की तरह ही इंडोनेशिया में रामायण बेहद लोकप्रिय है। 1973 में यहां की सरकार ने एक अंतर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन का आयोजन भी किया था! पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मे इंडोनेशिया  के प्रधानमंत्री को कहा कि तुम मुसलमान होते हुए राम और कृष्ण को कैसे मानते हो, तो उन्होंने जबाब दिया कि  We have changed our religion, but now our fourthfather . हमने अपना धर्म बदल लिया है, पर अपने पूर्वजों को नही बदला।


इंडोनेशिया के शिक्षा और संस्‍कृति मंत्री अनीस बास्वेदन ने भारत में मोदी सरकार से हर साल  इंडोनेशिया की रामायण पर आधारित रामलीला का मंचन भारत में करवाने की मांग की है। इंडोनेशिया यह भी चाहता है भारतीय कलाकार भी इंडोनेशिया के शहरों में जाकर रामायण का मंचन करे। इस कार्य के लिए भारत सरकार ने अपनी रूचि दिखाई है। बहुत जल्द इसके सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे तथा हिन्दू मुस्लिम भाईचारे को बढ़ावा मिलेगा। रामायण की प्रत्येक घटना मिथकों पर आधारित नही है। वैज्ञानिकों ने भी इनको सत्य माना है। 








6 सितंबर 2016

श्री गणेश की जन्म भूमि डोडिताल।

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 सनातन वैदिक धर्म मे ईस्वर को मनाने के लिए अस्टांग योग के अलावा मूर्ति पूजन का भी अपना महत्व है। दोनों मे ही विघ्न विनासक श्री गणेश का विशिस्ट स्थान है। किशी भी सुभ कार्य को करने से पहले गुरु की अर्चना करने के बाद श्री गणेश की अर्चना की जाती  है। पुराणों के अनुसार श्री गणेश का जन्म स्थान उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के संगमचट्टी (जहां अलखनन्दा और भागीरथी ) नदी का संगम है वहां से करीब 123 किलोमीटर  दूर अगोडा , मांझी होते हुएकरीब 22 किलोमीटर का पैदल और खतरनाक सफर करते हुए डोडीताल पहुँच
कर किया जा सकता है। यह अत्यंत दुर्गम स्थान पर स्थित है, जहां ऊँचे ऊँचे पहाड़ों के बीच एक सुंदर झील है। इस झील का पानी  प्राकृतिक रूप से स्वच्छ, शांत और निर्मल है। कहा जाता है कि यदि पेड़ की कोई पत्ती या कोई भी अन्य चीज इस झील के पानी मे गिरती है तो वहां रहने वाली चिड़िया इसे उठाकर बाहर कर देती है। आप इस शांत झील को देखकर ही समझ सकते है कि जिस झील मे माता पार्वती स्नान करती थी वह झील हज़ारों वर्षों बाद भी कितनी साफ़ स्वच्छ और निर्मल है। 


जब भगवान् शिव कैलाश पर्वत पर  ध्यानमग्न हो जाया करते थे तो पार्वती इस स्थान मे रहा करती थी। जहां उन्होंने एक दिन अपने उबटन से एक मूर्ति का निर्माण किया और उसमे शक्ति प्रकाश डाला। जिससे श्री गणेश का जन्म हुआ। श्री गणेश को माता ने अपना द्वारपाल नियुक्त कर लिया। ताकि वस्त्र धारण के समय कोई उस स्थान पर आ न सके। एक दिन शंकर जी पार्वती के पास आये तो श्री गणेश ने उनका रास्ता रोक लिया और शंकर जी को पार्वती के कक्ष मे नही जाने दिया। इस बात को लेकर दोनों मे भीषण युद्ध हुआ। शंकर जी ने क्रोधवस उसका मस्तक काट दिया, इस बात पर पार्वती को क्रोध आ गया और कहा कि यदि इस बालक के सिर को यदि अभी नही जोड़ा गया तो मे अभी अभी पूरी सृष्टि का विनाश कर दूंगी । यह बालक उनको बहुत प्रिय है। पार्वती के क्रोध को जानकर सारे देवता शंकर जी से बालक को जीवित करने की प्रार्थना करने लगे। तब शकर जी ने कहा कि जाओ जंगलों मे जो भी प्रथम जीव मिले उसका मस्तक ले आओ ।इस प्रकार शंकर ने गणेश के सर की स्थान और हाथी का सर जोड़ दिया। यह देखकर पार्वती बहोत नाराज हुई कहा शरीर मे आपने जानवर का सर जोड़कर मेरे बालक को कुरूप बना दिया। तब शंकर जी ने कहा कि इस बालक की पूजा अन्य सभी देवताओं से पहले होगी और बगैर श्री गणेश की पूजा के कोई भी सुभ कार्य का मनोरथ किसी को भी प्राप्त नही होगा। तब जाकर पार्वती का क्रोध शांत हुआ।इसलिए डोडीयाल के मंदिर मे  केवल माता पार्वती और श्री गणेश की मूर्तियाँ  की मूर्ति विराजमान है। शंकर जी को इस मंदिर से दूर रखा गया है।  
इस क्षेत्र के लोगों के नाम भी गणेश के नामों पर आधारित है। सभी लोग श्री गणेश को अपना आराध्य मानते है। कहा जाता है कि जिसकी कोई संतान उत्पन्न न हो तो यहां आकर मन्नत मांगने पर उसकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है। 

5 सितंबर 2016

जब आपत्तिजनक हालत में पकड़ी गई पूर्व विदेश मंत्री हीना रब्बानी

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पाकिस्तान की पूर्व विदेश मंत्री हीना रब्बानी खार अपनी काबिलियत से ज्यादा अपनी खूबसूरती की वजह से चर्चा में रही है, भारत के एक चैनल ने तो उन्हें विश्व की सबसे सुंदर महिला का ताज पहना दिया था, तो अमेरिकी अखबार ब्रिटले ने उन्हें सबसे स्टाइलिश महिला का खिताब दिया, लेकिन इन दिनों वो किसी दूसरे कारण से सुर्खियों में है।उनकी सुर्खीयों की वजह दरअसर पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और बेनजीर भुट्टो के बेटे बिलावल भुट्टो की वजह से है । बांग्लादेशी न्यूज एजेंसी टेबलॉयड दी ब्लिट्ज ने दावा किया है कि हिना रब्बानी और बिलावल भुट्टो के बीच जिस्मानी ताल्लुकात रहे हैं । एजेंसी ने यह भी दावा किया कि हिना रब्बानी के पति का उसके ऑफिस की ही किसी महिला के साथ अफेयर  था  और हिना ने उन्हें रंगे हाथ पकड़ लिया था।इस बात से वे बेहद निरास हो गयी जिस कारण वो नींद की गोलियां खाकर मरना चाहती थी । यह तनाव इतना ज्यादा था कि वो डिप्रेशन में चली गई थी, लेकिन ऐसे समय में  बिलावल उनके करीब आकर उन्हें डिप्रेशन से बाहर निकाला।  बिलावल से मिले प्यार की वजह से हिना उन्हें गिफ्ट्स भेजने लगी।
आसिफ अली जरदारी को मामले का पता तब चला जब ईद के मौके पर एक दिन तीनों यूएन में थे, तो हिना ने बिलावल को गुलदस्ता भेजा था, उसमे एक रोमांटिक संदेश भी था । उस गुलदस्ते में लिखा था, हमनें काफी इंतजार किया है अब इस इंतजार की इंतेहां होनी चाहिये। सक को सुलझाने के चक्कर मे जरदारी, बिलावल की हकीकत जानने के लिए उनके पीछे लग गए तो एक दिन उनका सक हक़ीक़त मे बदल गया और  उन्होने हिना और बिलावल को अंतरमस्त अवस्था में पाया। जरदारी ने इस बात का विरोध भी किया इस कारण  हिना और बिलावल से उनकी बहस भी हुई। मामले की जानकारी जब हिना के पति को हुई तो उसने भी आपत्ति जताई। लेकिन बिलावल को प्रेम का भूत सवार था, वह इन चीजों को नजरअंदाज कर हिना से निकाह करना चाहता था। लेकिन अपनी पारिवारिक मर्यादाओं की वजह से हिना पीछे हट गई और बिलावल का दिल टूटने के कारण उन्होंने पाकिस्तान छोड़ दिया।
यहीं से हिना और बिलावल एक-दूसरे से अलग हो गए,। बिलावल की मां बेनजीर भुट्टों भी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पूर्व पाकिस्तानी क्रिकेटर और अब राजनेता इमरान खान के साथ इश्क फरमा चुकी है। इस बात का खुलासा खुद इमरान खान ने अपनी किताब में किया है। हलांकि अब हिना रब्बानी और बिलावल भुट्टों के इश्क का मामला ठंडा हो चुका है, लेकिन इसे काफी समय तक पाकिस्तान में याद किया जाएगा।कवीर साहिब ने क्या खूब कहा है कि चासमेदिल से देख तू क्या क्या तमासे हो रहे, गुलसिताँ क्या क्या है तेरे दिल सताने के लिए, एक दिल लाखों तमन्ना, उसपे भी ज्यादा हवस, फिर ठिकाना है कहाँ, उसको बैठाने के लिए।

4 सितंबर 2016

अफगानिस्तान भड़का, 250 पाकिस्‍तानियों को देश निकाला।

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चमन स्थित पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर अब भी तनाव है। अफगानिस्‍तान ने तनाव के मद्देनजर 250 पाकिस्तानी कामगारों को देश से निकाल दिया है। पाकिस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार बाब-ए-दोस्ती द्वार 19 अगस्त को तब बंद कर दिया गया था, जब अफगान प्रदर्शनकारियों ने दोस्ती के इस द्वार पर हमला किया था और पाकिस्तान का एक झंडा जला दिया था। इस मुद्दे को सुलझाने के लिए इस द्वार को फिर से खोलने के कई प्रयास किए जा चुके हैं।

नाटो की आपूर्ति एवं सीमा पार व्यापार भी स्थगित है। लगभग 15 हजार अफगानी हर दिन सीमा पार करते हैं, जबकि हर हफ्ते हजारों वाहन इस सीमा से गुजरते हैं। इससे यह एक महत्वपूर्ण व्यापार संपर्क मार्ग बन गया है। इससे पहले दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया है। अफगानिस्तान के मुताबिक पाकिस्तान ने तोर्खम सीमा पर गेट लगाने का एकतरफा फैसला किया था जो सही नही था ।इससे पहले जून में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के सुरक्षा बलों के बीच तोर्खम में गोलीबारी हुई थी, जिसके परिणाम स्वरूप यह गेट लगभग एक हफ्ते तक बंद रहा।

3 सितंबर 2016

इज़राइल ने मात्र छह दिनों मे हराया तेरह देशों को।

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आपको याद होगा एक कार्टून बहोत मसहूर हुआ था  जिसमे दिखाया गया था कि इस्लामिक देश हमला करने आये थे और मार खाकर वापस भाग गए। जी हाँ ये सत्य है और अकल्पनीय भी, परंतु आपको पता होगा कि अरब मे इस्राएल को छोड़कर सभी देश इस्लामिक है। 1967 मे मजहबी आधार पर  मुस्लिम देशों ने इस्राएल को धमकी दी और इन देशों ने इजिप्ट इस्राएल विवाद मे इजिप्ट का साथ दिया था।वह इसलिए की इजिप्ट एक इस्लामिक देश है। लकिन इस्राएल ने डरे बगैर उनकी धमकी को एक कान से सुनकर दुसरे कान से निकाल दिया। नतीज़ा यह हुआ कि इजिप्ट के साथ 13 देशों ने क्रमश इजिप्ट, सीरिया, जॉर्डन, लेबनान, इराक, अल्जीरिया, कुवैत, लीबिया, मोरोक्को, सऊदी, फिलिस्तीन,सूडान और ट्यूनीसिया ने  मिलकर इस्राएल पर हमला कर दिया।इस युद्ध को सिक्स दे वार के नाम से जाना जाता है।पाकिस्तान ने भी अपनी तरफ से इजिप्ट का साथ देने के लिए अपने सैनिक भेजे।

     

इस्राएल के पास पचास हज़ार सैनिक थे, आठ सौ टैंक, 300 विमान थे जबकी मुस्लिम देशों के कुल मिलाकर 5 लाख 47 हज़ार सैनिक, 2504 टैंक और 957 विमान थे। यह युद्ध 6 दिनों तक चला जो 5 जून 1967 से 10 जून 1967 के बीच लड़ा गया। मात्र 6 दिनों मे इस्राएल ने सभी मुस्लिम देशों की सेनाओ को मात दे दी। युद्ध मे 983 इस्राएली सैनिक शहीद हुए, 409 टैंक , 46 विमान नस्ट हुए और 4517 सैनिक घायल हुए साथ ही 29 इस्राएली नागरिक घायल हुए। वही मुस्लिम देशों के 15000 इजिप्ट, 600 जॉर्डन, 2500 सीरिया, 10 इराकी सैनिकों को इस्राएली सेना ने मार गिराये साथ ही मुस्लिम देशों के 452 विमान ध्यस्त कर दिये। सभी 2504 टैंकों को भी नस्ट कर दिया। इस्राएल ने किसी मुस्लिम नागरिक को नही मारा। यह युद्व वार ऑफ़ सिक्स डे नाम से मसहूर होकर विश्व के इतिहास मे दर्ज़ हो गया। 
अब यही हाल फिर दिख रहा है जहाँ सभी 56 मुस्लिम देश भारत को आँखें दिखा रहे है। नतीज़ा क्या होगा यह भविष्य के गर्त मे छुपा है। भारत की प्रतिक्रया क्या होगी, इसका उत्तर आना अभी शेष है।

2 सितंबर 2016

तत्व ज्ञान।

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कहा जाता है कि दुनिया मे सबसे बड़ा ज्ञान कोई है तो वह है आत्म ज्ञान यानि अपने को जानना। जानना मतलब ज्ञान और न जानना मतलब अज्ञान।यदि आप किसी चीज के बारे मे विस्तृत जानकारी रखते है तो कहा जायेगा कि आपको उस चीज का ज्ञान है इसके उलट यदि आप वस्तु की विस्तृत जानकारी नही रखते तो कहा जायेगा कि आपको उस चीज की जानकारी नही है यानी आप अज्ञान मे  हैं । आत्म  तत्व को किसी किताब के माध्यम से समझना अत्यंत कठिन है। इसको प्राप्त करने के लिए सतगुरु की आवश्यकता पड़ेगी। वैसे तो आजकल दुनिया मे कई तरह के धार्मिक गुरु है , पर गुरु और सतगुरु मे अंतर है और यह अंतर बहुत बारीक है। सतगुरु मतलब सातवाँ गुरु। जैसे हमें अक्षर ज्ञान के लिए किताबों और स्कूलो का सहारा लेना जरूरी है उसी प्रकार आध्यात्मिक तत्व ज्ञान के लिए भी सतगुरु के पास जाना पड़ेगा। केवल गुरु ये काम नही कर पायेगा। पी एच डी करने के लिए लोअर क्लास से अपर क्लास तक कई गुरु बदलने पड़ते है जो अपनी योग्यता और अनुभव के आधार पर हमारे ज्ञान को पूर्ण करते हैं। क्लास 1 का गुरु पी एच डी नही पढा सकता है , हाँ जिसने पी एच् डी करी हो वह जरूर नीचे की कक्षाओं की पढ़ाई की जानकारी रखता होगा।यह सम्भव है।
अध्यात्म की क्लास मे भी पढाई इसी प्रकार होती है ताकि आपका ज्ञान विभिन्न गुरुओं के ज्ञान को पाकर ज्ञान के उच्च शिखर तक पहुँच सके।  आध्यात्मिक क्षेत्र मे माता पिता को प्रथम गुरु बताया गया है जो नवजात शिशु को पैदा करते है। दूसरा गुरु गर्भावस्था से शिशु को सावधानी पूर्वक बाहर ले कर आने वाली दाई को कहा गया। तीसरा गुरु उसे कहा गया जिसने शिशु का नामकरण किया, उसका एक उपयुक्त नाम सुझाया । दुनिया के लोग अब उसे इनके द्वारा सुझाये नाम से ही जानेंगे। चोथे गुरु के रूप मे शिक्षक को जिम्मेदारी दी गयी कि वह शिशु को अक्षर ज्ञान कराये ताकि शिशु अपनी बात समाज के सामने रख सके और लोगों की बातों को समझ सके। पांचवा गुरु वह हुआ जिसने बड़े होने पर विवाह संस्कार किया और कैसे जीना है, कैसे एक दुसरे की भावनाओं का ध्यान रखना है, इसकी शिक्षा दी। छटे गुरु ने धर्म की शिक्षा दी और बताया की इस धर्म को अपनाकर तुम ईस्वर प्राप्ति करना ताकि तुमदोनो का जीवन सफल हो सके । परंतु सातवे गुरु ने जो किया वह असाधारण था। सतगुरु ने उसको सारे धर्मों से ऊपर उठाकर एक ईस्वर मे जोड़ दिया।यह एक ऐसी बीमारी का इलाज़ था जिसको समझकर कोई संसय नही रह गया, मेरा तुम्हारा ईस्वर,  छोटा बड़ा ईस्वर, अच्छा बुरा  इत्यादि इन सबका भेद खत्म हो गया।  सभी धर्मो के  धर्मावलम्बी जानते है कि ईस्वर एक है परन्तु मानते नहीँ। सभी को अन्धेरा छांटने वाले की कमी महसूस हो रही है । सतगुरु ने  सारे संसय खत्म कर दिए।
सतगुरु ने बताया कि जब आत्मा ने प्राणों को धारण किया तब वह जीव बना। जीव यानी जिसमें भी जान है वो जीव है। जीव की जान उसके प्राण है। जीव के जब प्राण निकल जाते है तो वह आत्मा बन जाता है। प्राण यानी प्राणवायु। यह प्राणवायु भी पंचम भौतिक तत्वों मे से एक तत्व है। किसी भी जीव की काया या सरीर पञ्च भौतिक तत्वों से बना है । इन तत्वों के नाम क्रमशः पृथ्वी तत्व, जल तत्व, वायु तत्व, अग्नी तत्व और आकास तत्व हुए। जीव की काया और उसके कर्म करने के लिए माया  भी इन्ही पन्च तत्वों  से बनी है जो हमको दिखाई भी दे रही है । बनाने वाले ने सभी तत्वों का एक गुण बनाया है कि तत्व ही तत्व का नास करेगा। जिससे एक दिन सिर्फ एक तत्व रह जाएगा जिसको नास करने या न करने का अधिकार केवल उसको रहेगा। क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है। सभी तत्वों का नास हो जाने के कारण इन तत्वों को नासवान् कहा गया। वैज्ञानिक द्रष्टीकोण से इस केमिस्ट्री को देखा जाए कि कैसे तत्व ही तत्व का नास करता है ? पृथ्वी तत्व को जल तत्व अपने आप मे घोलित कर लेता है, पृथ्वी तत्व रहता ही नही।  जल तत्व को अग्नी तत्व सुखा देती है, जल रहता ही नही। अग्नी तत्व को वायू तत्व बुझा देती है, अग्नी रहती ही नही। वायू तत्व को आकाश तत्व विलोम कर देता है।वायू तत्व रहता नही। सब तत्वों के समाप्त होने के बाद भी अंतिम तत्व बचा रह जाता है, उसको समाप्त करने की ताकत केवल वह एक मे है जो है वह अंतिम ,सर्वशक्तिमान, सबका पिता, सबका मालिक । वह जब तक चाहे सृस्टि को बनाये रखे, यह उसकी अपनी इच्छानुसार तय है , यह कार्य उसके अलावा अन्य कोई नही कर सकता। प्रश्न पैदा होता है कि वह क्या है जिसका नास हो जाता है और वह क्या है जिसका नास नही होता। इसे ही सत्य और असत्य कहा गया। असत्य यानि जिसका नास होता है और सत्य अविनासी, जिसका कभी नास नही हो सकता। इस प्रकार हम कह सकते है कि काया और माया जो भी पंच भोतिक तत्वों से बनी है यह नासवान् होने के कारण असत्य है। तो फिर सत्य क्या है?  सत्य आत्मा है  आत्मा परमात्मा का अंस होने के कारण सभी जीवों मे सामान रूप से होते हुए अविनासी है। तभी तो कहा जाता है कि सरीर मरता है परंतु आत्मा नही मरती। सभी शास्त्रों मे आत्मा के सम्बन्ध मे उल्लेख है कि आत्मा अजर, अमर और अविनासी है और लगभग सभी धर्म इस बात को लेकर सहमत भी हैं। आत्मा को किसी शरीर को धारण करने की आवश्यकता नही है किन्तु जैसे बंदर घड़े के अंदर हाथ डालकर चना निकाल कर खाने की कोसिस मे अपनी मुट्ठी मे चनों को पकड़ता है और उसका हाथ घड़े के मुँह मे फस जाता है, अब न चने खाने को मिलते हैं और ना ही घड़ा उसके हाथ से छूटता है। जबकी सच्चाई यह है कि बन्दर घड़े के बंधन से अपने को मुठी खोलकर छुड़ा सकता है पर उसको यह युक्ति बताने वाला चाहिए। दरअसल बन्दर की ताकत ने खुद उसको बंधन मे डाल दिया है। इसी प्रकार आत्मा ने अपनी  ताक़त ने शरीर को पकड़ा हुआ है। अब उसे सतगुरु की जरूरत है को उसे बंधन मुक्त होने की युक्ति बताये। आत्मा शरीरों को तब तक धारण करते रहती है जब तक उसे इससे मुक्त होने का सच्चा मार्ग और ज्ञान प्राप्त न हो जाए। किताबों मे यह ज्ञान मिलना अति दुर्लभ है। यह कार्य सतगुरु बखूबी करेगा।

1 सितंबर 2016

खुद का खेल खुद के नियम

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पिछले कुछ वर्षों में तकनीक के कारण आए बदलाव की गति इतनी तेज रही है कि इसकी वजह से होने वाले परिणामों का विश्लेषण करना मुश्किल हो रहा है। ऑन लाइन व्यवसाय भी तेजी से फला-फूला है जिसने व्यवसाय की प्रक्रिया और नियमों को उलट-पुलट दिया है। नजर रखने वाले लोग पीछे हैं। यह खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। कई बड़ी कंपनियों (गूगल, अमेज़न, एप्पल, फेसबुक) का व्यवसाय पूरी दुनिया में फैल गया है। हर देश में इन्होंने प्रवेश कर लिया है। प्रत्येक देश के अपने नियम हैं। को लेकर अपने कानून हैं। वर्षों पूर्व बने कानून और नियमों के बीच संकरी गलियां हैं जिनका लाभ ये कंपनियां बखूबी उठा रही हैं। हर देश अपने स्तर पर नियमों में परिवर्तन कर रहा है, लेकिन ये काम मंथर गति से हो रहे हैं।  इन कं‍पनियों का इतना बड़ा नाम और धाक है कि इनसे सीधे भिड़ने में कई देश की सरकार हिचकती हैं। अरबों की संख्या में इनके ग्राहक हैं जिन्हें इन्होंने कई सुविधाएं मुफ्त में मुहैया करवा रखी है और इस कारण इनका कुछ बिगाड़ पाना बहुत ही मुश्किल है। ये कंपनियां व्यवसाय के खेल में अपने नियमों से व्यापार कर रही हैं। वर्षों बाद समझ में आया कि ये किस तरह सरकारों को टैक्स के नाम पर चूना लगा रही हैं, अपना एकाधिकार जमाने के लिए कानून की अवहेलना कर रही हैं। कुछ देशों की सरकार इनके दांवपेंच जान गई हैं और इन पर शिकंजा कसने की शुरुआत हो चुकी है। 

कानून की अवहेलना  
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ये बड़ी कंपनियां उन देशों में अपना ठिकाना बनाती हैं जहां टैक्स नहीं के बराबर लगता है। ये बहुत ही छोटे देश होते हैं या फिर वहां की सरकार इनकी मुठ्ठी में होती है। यहां से ये पूरे विश्व में व्यवसाय करती हैं।  कई देशों में नियम बहुत ही शिथिल हैं जिसका ये कंपनियां पूरा फायदा लेती हैं। मिसाल के तौर पर हमारे देश में ऑन लाइन शॉपिंग का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। कहीं पर भी बैठे-बैठे आप अपनी पसंदीदा चीज घर पर मंगवा सकते हैं। प्रदेश सरकार स्थानीय व्यापारियों से कई प्रकार के टैक्स लेती है, लेकिन ऑन लाइन शॉपिंग सर्विस प्रोवाइडर से कोई टैक्स नहीं वसूला जाता था। करोड़ों रुपये विज्ञापन के जरिये कमाता है। सर्च इंजन में खबरों, आलेखों और जानकारियों को आपके सामने एकत्रित कर लाता है। इन जानकारियों को बनाने में उसने रत्ती भर मेहनत भी नहीं की है। लेकिन सबसे ज्यादा फायदा उसी का होता है। धीरे-धीरे उसने ऑनलाइन विज्ञापनों में भी उसने अपनी घुसपैठ बना ली। प्रिंट, टीवी और रेडियो पर जारी विज्ञापनों के लिए कई तरह के नियम और कानून हैं, लेकिन ऑनलाइन विज्ञापन को लेकर कोई ठोस नीति सरकार के पास नहीं थी। निश्चित रूप से अपनी तकनीक का भरपूर लाभ गूगल को हुआ। पर आरोप लगा कि उसने कुछ पुस्तक प्रकाशकों पर दबाव डाला कि वो अमेज़न को दूसरे प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में कम कीमतों में पुस्तक दें ताकि अमेज़ॉन का दबदबा कायम रह सके। डाटा प्राइवेसी को लेकर हमेशा से संदेह के घेरे में रही है। फेसबुक पर करोड़ों यूजर्स आलेख, संदेश, फोटो और वीडियो डालते हैं। सिर्फ प्लेटफॉर्म मुहैया करा कर लोगों के डाटा के जरिये यह कंपनी खूब धन कमाती है। इस कंपनी के पास यूजर्स की कई निजी जानकारियां भी होती हैं और कहा जाता है कि यह डाटा उन लोगों को उपलब्ध कराया जाता है जिन्हें जरूरत होती है।

जाग उठी सरकार इन कंपनियों की दादागिरी, टैक्स के अंतर को लेकर जमावट और कार्य करने की नीतियां अब कई देशों को समझ आ रही है। में कई देश अब इन कंपनियों के खिलाफ आवाज उठाने लगे हैं और अपने नियमों को कड़े कर रहे हैं। कई देशों ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं।

  
यूरोप में गूगल, अमेज़न, फेसबुक और एप्पल पर अब टैक्स वसूली के नियम कड़े किए जा रहे हैं। हाल ही में यूरोपीयन एंटीट्रस्ट रेग्यूलेटर्स ने आयरलैंड को कहा है कि एप्पल ने टैक्स भरने में जो टालमटोल किया है उसे वह वसूले। यह रकम अरबों रुपये में है। टैक्सेशन को लेकर अमेरिकन तकनीकी कंपनियों की राह में रोड़े अटकाने शुरू कर दिए हैं। हाल ही के वर्षों में गूगल, फेसबुक और एप्पल को आर्थिक और प्राइवेसी मेटर को लेकर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। 
में ऑनलाइन शॉपिंग पर टैक्स लगाने की शुरुआत की गई है हालांकि यह कुछ प्रदेशों तक सीमित है। भारत से इन कंपनियों ने करोड़ों रुपये कमाए, लेकिन सरकार को ऊंट में मुंह में जीरा समान रकम दी। मात्र दो महीने पहले वित्त मंत्रालय ने भारतीन ऑन लाइन विज्ञापनदाताओं के लिए एक नया टैक्स लगाया जिसके मुताबिक विदेशी कंपनियों को ऑनलाइन विज्ञापन देने पर इक्वलाइजेशन लेवी वसूली जाएगी।  गूगल और अन्य आईटी कंपनियां यूरोप में निशाने पर है। फ्रांस, ब्रिटेन सहित कई देशों की शिकायत है कि यह कंपनियां उनके देश से भारी कमाई करती हैं, लेकिन टैक्स के भुगतान का आधार दूसरे देशों के नियमों अनुसार होता है जहां टैक्स दर बहुत कम होती हैं। टैक्स की चोरी के साथ-साथ इन कंपनियों ने कुछ दूसरे नियम भी भंग किए हैं। 
यूरोपीयन एंटीट्रस्ट ऑथोरिटीज़ ने गूगल पर प्रतिद्वंद्विता नियम को भंग करने का आरोप लगाया। इसके तहत गूगल ने कुछ कंपनी के विज्ञापन को इस तरह पेश किया जिससे ग्राहकों को ज्यादा विकल्प नहीं मिले। हालांकि गूगल ने इसका खंडन किया। यूरोपियन ऑफिशियल्स ने ईयू-यूएस नामक एक नया एंग्रीमेंट बनाया है जिसके तहत वे जान सकते हैं कि अमेरिकन कंपनियां लोगों के निजी डाटा, सोशल मीडिया पोस्ट्स, सर्च का उपयोग किस तरह करती हैं। 
 
नकेल कसना नहीं आसान इन कंपनियों के दबदबे को चुनौती देना आसान नहीं है क्योंकि आम लोगों में इनकी घुसपैठ है। ये व्यवसाय के चतुर खिलाड़ी हैं और कानून से निपटना बखूबी जानते हैं। सक्षम यूरोपीय देश इनसे पार नहीं पा रहे हैं तो दूसरे देशों की क्या बिसात। कई देशों की अदालत इन पर नकेल नहीं कस पाई। फ्रांस और ब्रिटेन सहित कई देशों में इन्होंने टैक्स की हेराफेरी की। अरबों रुपये नहीं चुकाए, लेकिन इनका कुछ ज्यादा बिगड़ा नहीं। हां, ये बात जरूर है कि आने वाले दिनों में इन कंपनियों को इस तरह खुल कर खेलने का अवसर नहीं मिलेगा। 

31 अगस्त 2016

आतंकी अब नहीं कर पाएंगे छुप कर वार

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कश्मीर के वर्तमान हालात को देखते हुए केंद्र ने एक बहुत बड़ी योजना बनाई है। आतंकियों के नापाक इरादों पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए सरकार अब इज़रायल की राडार तकनीक वाली दीवार खड़ी करने जा रही है। भारत सरकार अब रात के अँधेरे में, खेतों और भीड़-भाड़ वाले इलाकों से घुसने और मूवमेंट करने वाले आतंकियों को धर दबोचने के लिए इजरायल से Foliage Penetrating Radar खरीदने जा रही है।अगस्त के अंतिम सप्ताह में ख़ुफ़िया विभाग और दूसरी जांच एजेंसियों के बड़े अधिकारियों की एक टीम इजरायल के लिए रवाना होगी। Foliage penetrating Radar के जरिए जंगल और दुर्गम घाटी में घुस चुके आतंकियों को ढूंढने में मदद मिलेगी।

अब तक, हमारे जवानों को खुद हर कोने में जाकर आतंकियों को ढूँढना पड़ता था! जाहिर है कि ऐसे में, हमारे जवानों को बहुत ही मुश्किल का सामना करना पढ़ता था क्योंकि कोई भी कायर आतंकी, छुप कर आसानी से वार कर कर सकता था! लेकिन, अब भविष्य में ऐसा नहीं होगा!भारत सरकार एक कंट्रोल रूम का निर्माण करेगी, जिसमें कि इजरायली तकनीक द्वारा कश्मीर घाटी और भारत-पाक सीमा में घुसपैठ कर चुके और जंगलों में छिपे आतंकियों का पता लगाने के लिए निगरानी रखी जाएगी।आतंकी घुसपैठ को रोकने के लिए सुरक्षा एजेंसिया पूरे तौर पर नकेल कसने की तैयारी में जुटी हुई है। NSA अजित डोभाल की देखरेख में जम्मू-कश्मीर की सीमा पर इस पूरी योजना को लागू करने का काम शुरू हो गया है।इजराइल और अमेरिका की सहायता से इलेक्ट्रोनिक surveillance की मजबूत और अभेद बनाने की योजना है!